रक्षा बन्धन का कार्यक्रम आगामी 1-2 अगस्त 2012

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  • Thursday, August 02, 2012
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रक्षा बन्धन का कार्यक्रम आगामी 1-2 अगस्त 2012 को मथुरा आश्रम पर होगा। मथुरा आश्रम और गुरू महाराज से प्रेम रखने वाले गुरू भाई-बहन उपस्थित हों व लाभ उठावें। आज महारजगंज, उत्तर प्रदेश से 43 सेवादार आश्रम पर परमार्थी सेवाओं के लिए आए हैं।
जब-जब देश-दुनियाँ में उथल-पुथल होता है अनैतिकता बढ़ती है अराजकता बढ़ती है दुराचार, दुव्र्यवहार, व्याभीचार, मांसाहार, झूठ-छल-कपट का बोलबाला होता है तब-तब अवतारी शक्तियाँ इस धरा पर आती हैं। लोग अपने कर्मों का घड़ा भर लेते हैं तब लोगों के कर्मों का कर्मानुसार उनके संहार के लिए निमित्त अवतार आते हैं। उनमें काल का अंश अधिक और दयाल का अंश कम होता है। संत दयाल के अवतार होते हैं उन्हें नित्य अवतार कहते हैं। उनमें दया का अंश ही होता है और वे अपनी दया दृष्टि सब पर डालते हैं, सबका सुधार करना चाहते हैं। लेकिन जो उनके वचनों की अवहेलना करते हैं उनके चलाए हुए मार्ग के विपरीत चलते हैं दिखावटी भक्ति करते हैं अन्दर में छल-कपट रखते हैं सब तरह के अनैतिक कार्याें को करना उनके लिए संभव है ऐसे लोगों की तरफ से जब संत दृष्टि फेर लेते हैं तो काल उनके कर्मों का घड़ा फोड़ता है और उनके किए हुए कुकृत्यों से उनके साथ रहने वाले उनका साथ देने वाले उन गंदगियों में उन बदबुओं में उन बुराईयों मंे इस तरह से फंस जाते हैं कि उनको लौकिक और पार लौकिक दोनों तरह के कर्म बिगड़ जाते हैं। उनकी चीख-पुकार लाखों-लाखों कोस दूर तक जाती है लेकिन उनका कोई सहारा देने वाला नहीं होता।
परम पूज्य बाबा जयगुरूदेव जी महाराज वक्त के विलक्षण महापुरूष थे और संत श्रीरोमणि अनामीपुरूष के अवतार थे। उन्होंने अपनी जुबान से कहा था कि सबसे बड़ी अवतारी शक्ति उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में पैदा हो गई जिसकी उम्र 70 के दशक में कहा था कि 30 साल से बहुत ऊपर है और वह अवतारी शक्ति उन छोटी-छोटी अवतारी शक्तियों को एकत्र कर लेगी जो स्कूुल-काॅलेजों मे पढ़ रही हैं। और उनसे बहुत बड़ा काम करायेगी। बाबा जी स्वयं कुल मालिक के अवतार थे और उन्होंने 1983 में दिल्ली के वोट क्लब पर टाट पहनने का आदेश 9,10,11 जून के कार्यक्रम में यह कहते हुए दिया था कि-यह टाट पहनाने का कारण मैं अभी तो नहीं बताऊँगा जब काम हो जाएगा तो सारी दुनियाँ जान जाएगी लेकिन मैं इसमें रिद्धी-सिद्धी शक्ति ज्ञान भरूंगा जो दुनियाँ के लोगों के काम आयेंगे। यह हमारी योजना जन-जन तक धर्म-कर्म के प्रचार के लिए, आध्यात्म के प्रचार के लिए, शाकाहार के प्रचार के लिए, न्याय-नीति के प्रचार के लिए अन्याय को मिटाने के लिए, सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए लोगों के सामने एक दूरदर्शी योजना के रूप में आई है। समाज के लोग इसको राजनीतिक और अपने व्यक्तिगत लाभ की योजना समझकर रास्ते से भटक गए जबकि महात्मा ‘‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’’ की योजना को ध्यान में रखते हुए कोई काम करते हैं। गुरू महाराज ने एक वर्ष पहले से शाकाहार का घमासान प्रचार करने का अभियान चलाने को कहा था और यह कहा था कि इसी प्रचार के माध्यम से आप लोग इस काम में लगे रहें मैं परिवर्तन करके दिखा दूंगा। आज गुरू महाराज की नरदेहि लीला समाप्त हुई और लोग अज्ञान में उसी लीला के साथ उनकी सब लीलाओं को समाप्त समझकर अपनी कलयुगी लीला में मशगूल हो गए। ये बात भूल गए कि गुरू महाराज ने कहा था कि ‘‘कलयुग मे कलयुग जाएगा कलयुग में सतयुग आएगा।’’ अभी कलयुग गया नहीं सतयुग आया नहीं। कलयुग जब जाने लगेगा तो अपना कर्जा मांगेगा आप कर्जा दे नहीं पाओगे क्योंकि उसने झूठ का, छल-कपट का, बेईमानी का , अन्याय का, अत्याचार का, कर्जा दे दिया और आपने खुशी-खुशी ले लिया। आपकी रग-रग में वो कर्जा घुस गया, आप वापस कर नहीं पाओगे और उसका ऐसा लप्पड़-थप्पड़ पड़ेगा कि बीसों करोड़ का वारा-न्यारा हो जाएगा। अभी भी विचार करके वापस होकर मथुरा आश्रम से जो बाबा जयगुरूदेव के संदेश आपतक पहुंचाये जा रहे उस पर अमल करो। संत दयाल होते हैं दया आप पर होगी माफी आपको मिल जाएगी। वरना आपके कर्मों को कौन धोयेगा ? जिसने अपने कर्म नहीं धोये जिसकी आत्मा खुद भटक रही है जो खुद मान और धन के पीछे दीवाने हो रहे वो आपकी संभाल क्या करेंगे। जो उनके साथ धन और माया के पीछे दीवाना होकर लगे हुए हैं उन लोगों ने गुरू के वचन को ताक पर रख दिया। आज वही वचन हमारी आपकी सबकी संभाल करेगा। गुरू महाराज अन्तर्यामी थे उन्होंने होली के अवसर पर कहा था कि यह काया जरजर हो गई कभी भी जा सकते हैं लेकिन आपकी संभाल बराबर होगी क्योंकि-‘‘
शब्द स्वरूपी संग हैं, कभी न होते दूर,
निश्चय राखो चित्त में दीखेगा सत्नूर।’’
जो लोग आश्रम छोड़ दिए लोगों को आश्रम आने से रोक रहे हैं आश्रम के प्रति झूठी अफवाहें फैला रहे हैं आश्रम की झूठी अव्यवस्था की बातें लोगों तक पहुंचा रहे हैं वे लोग इस बात में इतना मशगूल हो गए हैं कि उनका फिर लौटकर सच्चाई के मार्ग को अपनाना इस जीवन में उनके लिए मुश्किल है। फिर भी आपसे निवेदन प्रार्थना है कि आप बुराईयों से हट जायें, आश्रम की व्यवस्था से जुड़ जायें। संगत में अपनी नहीं गुरू महाराज की बातों को बतायें। गुरू महाराज ने समय-समय पर हम सब लोगों को संभालने के लिए अपने अमृत वचनों को मिशाल के रूप में रखा है। नाम स,े नेह करना शब्द कमाई करना, गुरू में प्रेम-प्रतीत रखना बराबर सिखाया है। जिस गुरू ने रास्ता बताया है उसके रास्ते पर चलना ही चेले का काम है। गुरू के मार्ग पर न चलकर दूसरे को गुरू मानना ये व्यभीचारिणी जीवात्माओं का काम है इसलिए महापुरूष ने कहा कि-
शब्द बिना सुरत आंधरी, कहो कहां को जाए
द्वार न पाया शब्द का बहुर बहुर घर आए।
शब्द का द्वार उसी का खुलता है जो पतिव्रता स्त्री की तरह एक ही गुरू पर समर्पित होता है जिसने उसे नाम का भेद दिया। उसी महापुरूष का विश्वास रखना चाहिए चाहे वह पंच भौतिक शरीर में न भी हों तो जो उनका प्रकाश और शब्द रूप है वह सदा रहता है।